Saturday, October 3, 2009

खुशवंत सिंह का रामराज्य

खुशवंत सिंह हिंदी के लेखक नहीं हैं। लेकिन बचपन से मैं उन्हें हिंदी में पढता आया हूँ. जब भी उन्हें हिंदी चैनलों पर सुना हिंदी में बोलते हुए पाया. उनसे एक बार पूछा गया कि आप हिंदी में क्यों नहीं लिखते तो उनका जवाब था कि मुझे हिंदी में लिखने का शऊर नहीं है , यानि हिंदी में लिखने की कला से वह अनभिज्ञ हैं.

खुशवंत सिंह मुझे बेहद पसंद हैं...कारण? वह थोडा अलग हट कर सोचते हैं॥ बंधी बंधाई परिपाटी पर नहीं चलते हैं। उनके विचार उन्मुक्त हैं.. वह मनुष्यता और उसके जीने के ढंग को प्राथमिकता देते हैं। उनका लेखन भेदभाव रहित है। वह विद्रोही हैं. ताजी हवा का झोंका हैं. वह स्वयं को नास्तिक कहते हैं. लेकिन वह नास्तिक नहीं हैं, वह आस्तिक भी नहीं हैं. वह ईश्वर पर विश्वाश नहीं करते लेकिन जो बात अनुभव में आ जाये वह बिना लाग लपेट के सीधा अभिव्यक्त करते हैं....

वह सेक्स पर खुल कर बोलते हैं और इस धरती पर रहकर परिंदों की तरह आसमान में स्वच्छंद विचरण करते हैं। एक ही ढर्रे पर चलने वाले समाज के लिए वह "मिसफिट" हैं। छद्म नैतिकता के आवरण में दुबके समाज के लिए उनके विचार हानिकारक हो सकते हैं... ९४ साल की उम्र में भी उनके विचार युवा मानसिकता को मात देने वाले हैं... नए हिंदुस्तान के बारे में उनके विचार एक दम बिंदास हैं... उनके ही शब्दों में ....

"अपने सपनों के भारत के बारे में कई बातें कहना चाहता हूँ। सबसे पहले तो मैं चाहूँगा कि भारत धर्म, शकुन विचार, और जन्मपत्री तथा ज्योतिष जैसी चीजों में अन्धविश्वाश करना छोड़ दे। देश परम्पराओं के मुर्दा बोझ, स्त्रियों से भेदभाव, पर्दा, संयुक्त परिवार के बोझ और आयोजित विवाहों से स्वतंत्र हो जाये।


मेरी राय में विवाह की संस्था अनुपयोगी हो चुकी है। अब बिना बाधा के और आसानी से तलाक पाने की सुविधा होनी चाहिए। सेक्स का आनंद लेने की अधिक स्वतंत्रता होनी चाहिए। तथा शराब और नशीले पदार्थों पर प्रतिबन्ध नहीं रहना चाहिए. लोग अपना जीवन किस तरह जीना चाहते हैं ये पूरी तरह उन पर छोड़ दिया जाए...

दमन कारी कानूनों और लोगों के निजी मामलों में सरकारी हस्तक्षेप में आजादी हो... किसी प्रकार की हिंसा का भय न रहे... न तो सरकार से और न किसी व्यक्ति से, ताकि लोग जिन जंजीरों में बंधे हुए हैं, उनसे आजाद हो जाएँ तथा उत्पादनशील, रचनात्मक, स्वतंत्र हो सकें... मैं तो ऐसे रामराज्य का ही स्वप्न देखता हूँ... "
(द ' इल्लसट्रटिड वीकली' के एक पुराने अंक से तारिका में प्रकाशित एक स्तंभ से साभार.....)



10 comments:

अर्शिया said...

Prabhaavkaari hain ye vichar.
Think Scientific Act Scientific

रूपम said...

खुसवंत जी तो हमेशा से युवा थे और हमेशा ही युवा रहेंगे , और जिस तरह आपने अपने विचार प्रस्तुत किये है उससे लगता है की आप भी युवाओं की शीर्ष पंक्ति में खड़े हुआ है
वहुत अच्छा लगा आपको पढ़कर .....
हमेशा की तरह एक अच्छा लेख पढ़कर आत्मा को आजादी का झोंका सा महसूस हुआ...
मनोकामना है की खुसवंत सिंह जी का रामराज्य जल्दी दुनिया पर राज करे .

Arvind Mishra said...

सच है खुशवंत चिर युवा है बल्कि उनका कैशोर्य ऐसा की सचमुच के किशोर अपनी अकर्मण्यता पर लजाएँ !

संजीव कुमार सिन्हा said...

शराब और नशीले पदार्थों पर प्रतिबन्ध नहीं रहना चाहिए. लोग अपना जीवन किस तरह जीना चाहते हैं ये पूरी तरह उन पर छोड़ दिया जाए...

खुशवंत सिंह यह कहकर देश में अराजकता फैलाना चाहते हैं। उनका भारत की माटी से कोई सरोकार नहीं है। शायद अंग्रेजी में लिखने-पढने और सोचने के कारण वे भारत को समझ नहीं पाएं।

रामकुमार अंकुश said...

संजीव जी टिप्पणी के लिए धन्यवाद..
मैं शराब नहीं पीता और न ही किसी अन्य नशीले पदार्थों का उपयोग करता हूँ. लेकिन जो थोडी मस्ती के लिए पीते हैं मैं उसे बुरा भी नहीं मानता. ...आज नशीले पदार्थों पर प्रतिबन्ध के बावजूद एक बहुत बड़ा प्रतिशत नशीले पदार्थों का सेवन करता है... गावौं में बीडी, सिगरेट तम्बाकू शराब प्रतिष्ठा का प्रतीक हैं अराजकता का नहीं...
मैं इन नशीले पदार्थों का समर्थन नहीं कर रहा हूँ. लेकिन यदि कोई पसंद करता है तो मैं उसका विरोध भी नहीं करता हूँ...उसकी अपनी जिन्दगी है. हाँ, यदि वह पी कर दूसरों की स्वतंत्रता पर आक्रमण करे तो उसका विरोध जायज है. खुशवंत सिंह एक अच्छे पियकड़ हैं और ९४ साल की अवस्था में भी पीते हैं यही नहीं मैंने सुना है उन्होंने अपने दादी को भी पीना सिखाया था . उनकी कथनी और करनी एक है. वह एक विशुद्ध निष्कपट भारतीय सिख हैं....

Aarjav said...

मेहनती और अच्छे आदमी है खुशवंत सिंह .........अभी हाल फिलहाल में उनकी एक किताब मिल गयी है --In the company of women |पढ़ रहा हूँ ! जाहिर है रुचिकर और विचारपूर्ण ही होगी ! वैसे भारतीय समाज के हिसाब से कुछ ज्यादा ही उन्मुक्त है सिंह जी !!

सतीश सक्सेना said...

ईमानदारी की इज्ज़त होनी चाहिए , सच्चाई यही है हम अपने को ढके रहकर, दूसरों पर उंगली उठाते हैं ! मुझे लगता है यह समाज का सबसे बड़ा विरोधाभास है , इसे ख़त्म करने के लिए प्रयत्न करने वालों का अभिनन्दन होना चाहिए !

अरुण राजनाथ / अरुण कुमार said...

main to bas itna jaanta hoon ki jab 'Operation Bluestar' hua to virodh mein Kushwant Singh ji ne apna 'Padma Award' vaapas kar diya tha.

Manoj Bharti said...

रामकुमार अंकुश जी !

सादर प्रणाम!

आपने खुशवंत सिंह पर बहुत अच्छा लिखा है । मैं भी उन्हें हिंदी के अखबारों में पढ़ता आया हूँ । खुशवंत सिंह एक जीवंत व्यक्ति हैं और उन्होंने अपने अनुभव से सीखा है, मैं आपके आलेख से पूर्णत: सहमत हूँ, एक समय पर वे ओशो के कट्टर दुश्मन रहें हैं ... लेकिन अपने अनुभवों और समाज के असली चेहरे को पहचानते हुए बाद में उन्होंने ओशो और उनके जीवन को बहुत ही प्रमाणिक माना है । आपने उनके जो विचार इस आलेख में दिए हैं, वे भी ओशो से प्रेरित हैं । ओशो किसी भी प्रकार के आवरण को पसंद नहीं करते । वे दमन के भी विरोध में थे । वस्तुत: दमन जीवन में कहीं नहीं पहुँचाता ? लेकिन व्यक्ति को अपनी समझ से सब कुछ चुनने का अधिकार रहना चाहिए, फिर यदि किसी को दमन में आनंद मिलता है, तो दमन ही करे, लेकिन अपने स्वभाव से जिए ।

सादर,

मनोज भारती

http://gunjanugunj.blogspot.com
पर मेरे आलेख, विचार और कविताओं के लिए आपका स्वागत है ।

Aflatoon said...

भाई रामकुमार आपका ब्लॉग अच्छा लगा । आते रहेंगे। मैं बनारस का हूं लेकिन इटारसी आना-जाना होता है ।