Wednesday, September 2, 2009

मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान हूँ

हमारा इंडिया चमक रहा है... शायनिंग इंडिया... प्रोग्रेसिव इंडिया...वैभव विलास से परिपूर्ण इंडिया...
यहाँ ऊँची ऊँची अट्टालिकाएं हैं. धन का मादक नृत्य है और अधिक धन कमाने की लालसा है.
प्रकृति से विरत कंक्रीट के घने जंगलों में प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ है....
रंगी पुती आधुनिक अप्सराएँ हैं, प्रेम को कालकोठरी में कैद करने वाले सेक्स के पुजारी हैं...यहाँ पैसा है, प्रतिष्ठा है और अपने अपने अंहकार हैं...

एक गरीव भारत भी है ठीक दुष्यंत की गजल के एक शेर की तरह.....
कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए
मैंने पूछा नाम तो बोला की हिंदुस्तान हूँ॥

जहाँ गरीबी है, फटे चीथड़े हैं. और जानवरों का सा जीवन है. झोपड़ पट्टियाँ है, कचरे में से प्लास्टिक बीनते अबोध मासूम कृशकाय बच्चे भी हैं.......

कबाड़खाने में तब्दील रेल के डिब्बों में अपना आशियाना बनाये हुए ऐसी मांएं भी हैं। जिन्हें अपने बच्चों के पिता का पता नहीं है, जो एक रोटी की खातिर अपने शरीर का शोषण करवाने के लिए मजबूर हैं...

बीमारी है, अंधविशवास हैं, राजनीती की चक्की में पिसकर अपना ही घर जलाने वाले मध्यमवर्गीय युवा हैं। साम्प्रदायिक लपटें हैं. धर्म के धंधेबाजों का भयानक जाल है....

अपनी ही समस्याओं से जूझता प्रतिभा संपन्न युवा वर्ग है। नशे की आग में खुद को झोकती समाज द्वारा भ्रमित की गयी युवा पीढी है. भेदभाव की भट्टी में जलती हुयीं शोषित महिलायें हैं....

संवेदनाओं का देश
यहाँ बुद्ध हैं, महावीर हैं, मीरा हैं, कृष्ण हैं, कबीर हैं, राबिया हैं, ओशो रजनीश हैं, जिद्दु कृष्णमूर्ति हैं, धन की लालसा पर विजय प्राप्त करने वाली और कला को नए पंख देने वाली परम चेतनाएं भी हैं ऐसा प्रबुद्ध वर्ग भी है, जो दूसरों के आंसुओं से द्रवित होता है, और अपनी विकल संवेदनाओं से मनुष्य जीवन को जीने की उमंग से परिपूरित कर देता है, लेकिन ऐसी चेतनाएं कितनी हैं, स्वयं को बदलो तो दुनिया बदल जाती है,किन्तु क्या हम स्वयं को बदलने को तैयार हैं....???

5 comments:

अनिल कान्त : said...

koshish karne mein kya harz hai

Udan Tashtari said...

सभी दुनिया को बदलने के बारे में सोचते हैं, किंतु कोई अपने आप को बदलने के बारे में नहीं सोचता।

-लियो टॉलस्टॉय

anurag said...

एक बार फिर आपकी लेखनी ने एक तीर से कई निशाने साध कर सिद्ध कर दिया की बेबाक पत्रकारिता अभी जिंदा है लेख प्रासंगिक ही नहीं मर्मस्पर्शी भी है सोचने पर मजबूर कर देने वाले इस लेख के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

रूपम said...

kuch aur shesh nahi raha hai hindustan par bolne ko.
kafi kum pratisat hai bhalai ka burai ke uper ,
par sabse badi samsya hai navjat dimaag ko jhooti baaton se bramit ker dene ki, jiske liye palak utterdayi hai.

Rajesh Kumar said...

हां मैं तैयार हूँ. अपनी चेतना को बदलने के लिए. बस आप जैसे लोगों का साथ चाहे