Saturday, September 19, 2009

समाज से बहिष्कृत अब ब्लॉग दुनिया में

न उम्र की सीमा हो न जन्म का हो बंधन
जब प्यार करे कोई तो देखे केवल मन
यह गीत एक ज़माने में सबसे अधिक सुना गया था
जगजीत सिंह की रेशमी आवाज ने और इस गीत में लिखी पंक्तियों ने लोगों का दिल जीत लिया. यह गीत आज भी कर्णप्रिय है, और निश्चित रूप से कल भी रहेगा.
इसमें लिखी पंक्तियों को सुनकर लोगों का मनमयूर नाच उठता है. क्या बात लिखी है "न उम्र की सीमा हो न जन्म का हो बंधन" वाकई में मन प्रेम करने को मचल जाता है...

किसी प्रसिद्द कवि ने कहा है कि 'हिंदुस्तान में प्यार के मामले में सिर्फ थ्योरी चलती है. हम इस गीत में वर्णित पंक्तियों को भी थ्योरी के रूप में लेते है. और झूम उठते है...
लेकिन असल जिन्दगी में जब कोई प्रेमी ऐसा कदम उठा लेता है, तो हंगामा खडा हो जाता है...
सामाजिक मान मर्यादाएं, इज्जत प्रतिष्ठा दिखाई देने लगती है..
कितने दोगले लोग हैं हम....?

ऐसा ही एक साहसी कदम उठाया था कुछ वर्ष पूर्व पटना में रहने वाले हिंदी के प्रोफेसर श्री मटुक नाथ चौधरी और उनकी शिष्या प्रेमिका जूली ने...
पहले प्रेम हुआ, फिर शादी करली , समाज में भूचाल आ गया. प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रोनिक मीडिया, समाज सेवी संस्थाओं ने अपना झंडा और डंडा बुलंद करने के लिए उनका सामाजिक बहिष्कार किया. मटुक नाथ को प्रेम करने के जुर्म में विश्वविद्यालय ने नौकरी से निकाल दिया, उन्हें पत्थर मारे गए, उनके चेहरे पर कालिख पोती गई, वह समाज के नैतिक बदमाशों द्वारा रातोंरात खलनायक बना दिए गए ...

लेकिन मटुक नाथ और उनकी शिष्या प्रेमिका अपने इरादों पर अडिग रहे और आज खुशहाल जीवन जी रहे हैं..

समाज के मानदंडों के आधार पर जीने वाले लोगों को यह नागवार गुजर सकता है कि अपनी उम्र से लगभग आधी, अपनी शिष्या के साथ कोई प्रेम करे! लेकिन एक स्वतंत्र व्यक्तित्व को इन बातों से कोई प्रयोजन नहीं होता है..

बहरहाल आज इस साहसी जोड़े ने ब्लॉग कि दुनिया में

जूलीमटुक के नाम से कदम रखा है उनका लेखन भी एकदम जीवंत है... में समझता हूँ ब्लॉग दुनिया इनका गर्मजोशी से स्वागत करेगी....

Wednesday, September 16, 2009

ये एक शव्द वाले टिप्पणी बाज

ब्लॉग की दुनिया बड़ी रोचक और कुछ विचित्र भी है. यहाँ श्रेष्ठतम भी लिखा जा रहा है, और कचरा भी परोसा जा रहा है.
किसी रचना पर टिप्पणी करने वाले अधिकांश चिट्ठेकार ही हैं,
कुछ चिट्ठेकार ऐसे भी हैं जो रचनाएं पढने की जहमत नहीं उठाते बिना पढे ही टिप्पणी टपका देते हैं.
ऐसे कुछ नमूने देखिये.....

फलां ने कहा......
उम्दा...

अमुक साहब ने कहा ....
सुन्दर.......

"क" ने कहा ....
नाइस...

वाह! , खूब! , बढ़िया!, आभार... लिखते रहिये... बधाई... सही॥ आदि शव्द ऐसी ही टिप्पणियों के नमूने हैं। असल में इन टिप्पणियों का अभिप्राय सभी समझते हैं। इन्हें अपने ब्लॉग का पता ठिकाना देना होता है, बस।

कुछ चिट्ठेकार इस ताक में रहते हैं कि चिटठा जगत में किस नए मुर्गे का आगमन हुआ ये रचनाकार की प्रोफाइल या उसने ब्लॉग पर क्या लिखा है, इसके चक्कर में नहीं पड़ते ये ब्लोगर्स केवल यू। आर. एल छोड़ने वाले होते हैं. इन्हें टिप्पणीकार नहीं बल्कि टिप्पणीबाज कहना ज्यादा सही होगा क्योंकि ये पांच मिनिट में आठ दस चिट्ठे तो निबटा ही देते होंगे.


मैं अभी मुझ जैसे ही नए ब्लोगर्स की रचनाएं पढ़ रहा था.एक टिप्पणीकार बड़े विचित्र मालुम पड़े बाकायदा दो तीन नए चिट्ठों पर उनकी टिप्पणियाँ पढने को मिलीं सभी पर उनकी टिप्पणियाँ एक जैसी थीं. हालाँकि जिस रचना पर वह टिप्पणी दे रहे थे वह काफी प्रभावपूर्ण रचना थी.
एक आकर्षक सुन्दर कविता पर उनकी टिप्पणी देखिये...

"आपने जो वर्ड वेरिफिकेशन लगा रखा है. उसे हटा दें. वर्ड टाइप करने में बड़ी परेशानी होती है... "
आगे कैसे वर्ड वेरिफिकेशन हटाया जाता है उसका पूरा विवरण था.

अब ऐसे चिट्ठेबाजों को सुन्दर, असुंदर कृति से कोई विशेष लगाव नहीं होता है. ये टिप्पणी कार सीधे टिप्पणी के बटन पर प्रहार करते हैं और देखते हैं कि वर्ड वेरिफिकेशन है की नहीं, अब यदि है, तो " तेरी ये हिम्मत! अभी मजा चखाता हूँ; खा मेरी टिप्पणी !" और पहले से सहेज कर रखी टिप्पणी को कापी किया, चिपका दिया ...!
और बेचारा नया ब्लोगर अपने सारे काम छोड़ कर वर्ड वेरिफिकेशन हटाने की गुत्थी में उलझ जाता है.....

मैं धुरंधर और लिक्खाड़ चिट्ठेकारों की बात नहीं कर रहा हूँ । नया ब्लोगर कुछ नया लिख देता है, लेकिन वह खुद कन्फ्यूज होता है.'ठीक ठाक है की नहीं यार! एक तो पहले से ही भयानक कन्फ्यूजन, दूसरे छपने के बाद टिप्पणियाँ , सुन्दर! वाह! खूब! लिखते रहिये अब ब्लोगर अपना नया पुराना सारा कचरा पाठकों के सामने परोस देता है।

ठीक है साहब! आप बहुत अच्छा लिखतें हैं । आप बहुत कुछ हैं. तो टिप्पणियों में कुछ तो लिखिए वैसे भी अपनी हिंदी भाषा में लिखने बोलने का काफी चलन है किसी पुस्तक की भूमिका का शीर्षक "दो शव्द" होता है, और लेखक दो तीन पेज भर देते हैं कोई वक्ता दो शव्द कहना चाहता है और पूरा एक घंटा ले लेता है. तो आप टिप्पणी के लिए दो चार शव्द लिखने में क्यों कंजूसी करते हैं?


यदि रचना सुन्दर है तो क्यों? यदि उसमे कुछ कमी है तो क्यों ?इस क्यों शव्द पर ही थोडा विचार विमर्स कर लीजिये वैसे यह "क्यों" शव्द बड़ा आध्यात्मिक शव्द है, इस शव्द में जीवन के बड़े भारी रहस्य छुपे हैं. इस शव्द का उत्तर खोजने में दिल और दिमाग दोनों का उपयोग करना पड़ता है.

एक शव्द की टिप्पणी देकर हम एक गलत परम्परा की शुरुआत कर रहे हैं, ब्लॉग की दुनिया के लिए शायद ये लाभदायक न हो।

हमें मालूम है कि हम सभी पाठकों लेखकों को अपनी चोखट, चौपाल पर बुलाना चाहते हैं। यह स्वाभाविक है लेकिन आमंत्रण पत्र थोडा मित्रवत हो तो क्या कहना.

एक सच्चा मित्र चापलूसी नहीं करता , वह अपने मित्र की प्रशंसा करता है. लेकिन साथ ही उसकी कमजोरियों को स्वस्थ आलोचना के साथ उसके सामने लाता है .

Wednesday, September 2, 2009

मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान हूँ

हमारा इंडिया चमक रहा है... शायनिंग इंडिया... प्रोग्रेसिव इंडिया...वैभव विलास से परिपूर्ण इंडिया...
यहाँ ऊँची ऊँची अट्टालिकाएं हैं. धन का मादक नृत्य है और अधिक धन कमाने की लालसा है.
प्रकृति से विरत कंक्रीट के घने जंगलों में प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ है....
रंगी पुती आधुनिक अप्सराएँ हैं, प्रेम को कालकोठरी में कैद करने वाले सेक्स के पुजारी हैं...यहाँ पैसा है, प्रतिष्ठा है और अपने अपने अंहकार हैं...

एक गरीव भारत भी है ठीक दुष्यंत की गजल के एक शेर की तरह.....
कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए
मैंने पूछा नाम तो बोला की हिंदुस्तान हूँ॥

जहाँ गरीबी है, फटे चीथड़े हैं. और जानवरों का सा जीवन है. झोपड़ पट्टियाँ है, कचरे में से प्लास्टिक बीनते अबोध मासूम कृशकाय बच्चे भी हैं.......

कबाड़खाने में तब्दील रेल के डिब्बों में अपना आशियाना बनाये हुए ऐसी मांएं भी हैं। जिन्हें अपने बच्चों के पिता का पता नहीं है, जो एक रोटी की खातिर अपने शरीर का शोषण करवाने के लिए मजबूर हैं...

बीमारी है, अंधविशवास हैं, राजनीती की चक्की में पिसकर अपना ही घर जलाने वाले मध्यमवर्गीय युवा हैं। साम्प्रदायिक लपटें हैं. धर्म के धंधेबाजों का भयानक जाल है....

अपनी ही समस्याओं से जूझता प्रतिभा संपन्न युवा वर्ग है। नशे की आग में खुद को झोकती समाज द्वारा भ्रमित की गयी युवा पीढी है. भेदभाव की भट्टी में जलती हुयीं शोषित महिलायें हैं....

संवेदनाओं का देश
यहाँ बुद्ध हैं, महावीर हैं, मीरा हैं, कृष्ण हैं, कबीर हैं, राबिया हैं, ओशो रजनीश हैं, जिद्दु कृष्णमूर्ति हैं, धन की लालसा पर विजय प्राप्त करने वाली और कला को नए पंख देने वाली परम चेतनाएं भी हैं ऐसा प्रबुद्ध वर्ग भी है, जो दूसरों के आंसुओं से द्रवित होता है, और अपनी विकल संवेदनाओं से मनुष्य जीवन को जीने की उमंग से परिपूरित कर देता है, लेकिन ऐसी चेतनाएं कितनी हैं, स्वयं को बदलो तो दुनिया बदल जाती है,किन्तु क्या हम स्वयं को बदलने को तैयार हैं....???

Tuesday, August 25, 2009

मंटो साहब आपकी कहानी 'बू' तो बड़ी बदबू फैला रही है...!

मित्रों के आग्रह पर लगा की मंटो के बारे में और चर्चा की जाए वैसे इस अनुभवी रूह के बारे में जानना और पढना अत्यंत रोमाचक और रोचक है। मंटो का सफर केवल ४२ वर्ष रहा. अलविदा कहने से पहले के १९ वर्षों के सफर में हमें उनसे २३० कहानियां ६७ रेडियो नाटक २२ शव्द चित्र, और ७० लेख मिले.मंटो के १४ कहानी संग्रह प्रकाशित हुए।

इन संग्रहों में स्याह हाशिये, नंगी आवाजें ,खोल दो , टोबा टेकसिंह, बू, धुवां, काली शलवार आदि चर्चित कहानियां शामिल हैं। छद्म नैतिकता की आढ़ में इन कहानियों को समाज द्वारा अश्लील घोषित किया गया और मंटो पर मुक़दमे चलाये गए। मंटो इन मुकदमों से मानसिक रूप से बहुत आहत हुए लेकिन उनके क्रन्तिकारी तेवर कभी नहीं बदले।
इन मुकदमों से सम्बंधित एक दिलचस्प घटना है। एक व्यक्ति ने मंटो से कहा "भाई मंटो आपकी कहानी 'बू' तो बड़ी बदबू फैला रही है. मंटो का जवाब था तो आप फिनाइल लिख दें" मंटो से अक्सर पूछा जाता आप क्यों लिखते है.....? मंटो इसका बहुत संजीदगी से जवाब देते थे उन्ही के शव्दों में ....
यह एक ऐसा सवाल है कि मैं क्यों खाता हूँ... मैं क्यों पीता हूँ... लेकिन इस दृष्टि से मुख़तलिफ है कि खाने और पीने पर मुझे रुपए खर्च करने पड़ते हैं और जब लिखता हूँ तो मुझे नकदी की सूरत में कुछ खर्च करना नहीं पड़ता. पर जब गहराई में जाता हूँ तो पता चलता है कि यह बात ग़लत है इसलिए कि मैं रुपए के बलबूते पर ही लिखता हूँ.लोग कला को इतना ऊँचा रूतबा देते हैं कि इसके झंडे सातवें असमान से मिला देते हैं. मगर क्या यह हक़ीक़त नहीं कि हर श्रेष्ठ और महान चीज़ एक सूखी रोटी की मोहताज है?मैं लिखता हूँ इसलिए कि मुझे कुछ कहना होता है. मैं लिखता हूँ इसलिए कि मैं कुछ कमा सकूँ ताकि मैं कुछ कहने के काबिल हो सकूँ.

रोटी और कला का संबंध प्रगट रूप से अजीब-सा मालूम होता है, लेकिन क्या किया जाए कि ख़ुदाबंद ताला को यही मंज़ूर है. वह ख़ुद को हर चीज़ से निरपेक्ष कहता है-यह गलत है. वह निरपेक्ष हरगिज नहीं है. इसको इबादत चाहिए. और इबादत बड़ी ही नर्म और नाज़ुक रोटी है बल्कि यूँ कहिए, चुपड़ी हुई रोटी है जिससे वह अपना पेट भरता है।

मेरे पड़ोस में अगर कोई औरत हर रोज़ खाविंद से मार खाती है और फिर उसके जूते साफ़ करती है तो मेरे दिल में उसके लिए ज़र्रा बराबर हमदर्दी पैदा नहीं होती। लेकिन जब मेरे पड़ोस में कोई औरत अपने खाविंद से लड़कर और खुदकशी की धमकी देकर सिनेमा देखने चली जाती है और मैं खाविंद को दो घंटे सख़्त परेशानी की हालत में देखता हूँ तो मुझे दोनों से एक अजीब व ग़रीब क़िस्म की हमदर्दी पैदा हो जाती है।

किसी लड़के को लड़की से इश्क हो जाए तो मैं उसे ज़ुकाम के बराबर अहमियत नहीं देता, मगर वह लड़का मेरी तवज्जो को अपनी तरफ ज़रूर खींचेगा जो जाहिर करे कि उस पर सैकड़ो लड़कियाँ जान देती हैं लेकिन असल में वह मुहब्बत का इतना ही भूखा है कि जितना बंगाल का भूख से पीड़ित वाशिंदा.......

चक्की पीसने वाली औरत जो दिन भर काम करती है और रात को इत्मिनान से सो जाती है, मेरे अफ़सानों की हीरोइन नहीं हो सकती। मेरी हीरोइन चकले की एक टखयाई रंडी हो सकती है. जो रात को जागती है और दिन को सोते में कभी-कभी यह डरावना ख्वाब देखकर उठ बैठती है कि बुढ़ापा उसके दरवाज़े पर दस्तक देने आ रहा है. उसके भारी-भारी पपोटे, जिनमें वर्षों की उचटी हुई नींद जम गई है, मेरे अफ़सानों का मौजूँ (विषय) बन सकते हैं. उसकी गलाजत, उसकी बीमारियाँ, उसका चिड़चिड़ापन, उसकी गालियाँ-ये सब मुझे भाती हैं-मैं उसके मुताल्लिक लिखता हूँ और घरेलू औरतों की नफ़ासत पसंदी को नज़रअंदाज कर जाता हूँ.........

मैं जानता हूँ कि मेरी शख्सियत बहुत बड़ी है और उर्दू साहित्य में मेरा बड़ा नाम है। अगर यह ख़ुशफ़हमी न हो तो ज़िदगी और भी मुश्किल बन जाए. पर मेरे लिए यह एक तल्ख़ हक़ीकत है कि अपने मुल्क में, जिसे पाकिस्तान कहते हैं, मैं अपना सही स्थान ढूंढ नहीं पाया हूँ. यही वजह है कि मेरी रूह बेचैन रहती है. मैं कभी पागलखाने में और कभी अस्पताल में रहता हूँ.

मुझसे पूछा जाता है कि मैं शराब से अपना पीछा क्यों नहीं छुड़ा लेता? मैं अपनी जिंदगी का तीन-चौथाई हिस्सा बदपरहेजियों की भेट चढ़ा चुका हूँ। अब तो यह हालत है- मैं कभी पागलखाने में और कभी अस्पताल में रहता हूँ.........मैं समझता हूँ कि जिंदगी अगर परहेज़ से गुजारी जाए तो एक क़ैद है. अगर वह बदपरहेजियों से गुज़ारी जाए तो भी एक क़ैद है. किसी न किसी तरह हमें इस जुराब के धागे का एक सिरा पकड़कर उधेड़ते जाना है और बस.

और अंत में धर्म के दोगलेपन को उजागर करती मंटो की एक लघुकथा ...।

घाटे का सौदा

दो दोस्तों ने मिलकर दस-बीस लड़कियों में से एक चुनी और बयालीस रुपये देकर उसे ख़रीद लिया.रात गुज़ारकर एक दोस्त ने उस लड़की से पूछा : “तुम्हारा नाम क्या है?”लड़की ने अपना नाम बताया तो वह भिन्ना गया : “हमसे तो कहा गया था कि तुम दूसरे मज़हब की हो....!”लड़की ने जवाब दिया : “उसने झूठ बोला था!”यह सुनकर वह दौड़ा-दौड़ा अपने दोस्त के पास गया और कहने लगा : “उस हरामज़ादे ने हमारे साथ धोखा किया है.....हमारे ही मज़हब की लड़की थमा दी......चलो, वापस कर आएँ.....!”

Saturday, August 15, 2009

कृशन चंदर के कुछ व्याकुल शब्द आवारा मंटो की मौत पर

एक अनोखी घटना घटी है। मंटो मर गया है। यों तो वह एक अरसे से मर रहा था। कभी सुना कि वह पागलखाने में है। कभी सुना कि वह ज्यादा शराव पीने से अस्पताल में पड़ा है। कभी सुना कि उसके यार दोस्तों ने भी उसका साथ छोड़ दिया है। कभी सुना कि वह और उसके बच्चे फाकाकशी कर रहे हैं। बहुत सी बातें सुनी हमेशा बुरी बातें सुनीं, लेकिन विश्वाश नहीं हुआ ; क्योंकि इस समय भी उसकी कहानियाँ बराबर छपती रहीं; अच्छी कहनियाँ भी और बुरी कहानियाँ भी; जिन्हें पढ़कर मंटो का मुंह नोचने को जी चाहता था , ऐसी कहानियाँ भी जिन्हें पढ़कर मुहं चूमने को जी चाहता था.....

मगर आज रेडियो पाकिस्तान ने यह ख़बर सुनाई कि मंटो धड़कन बंद हो जाने से चल बसा तो दिल और दिमाग चलते चलते एक क्षण के लिए रुक गए .....

मेरी आँख में आंसू का एक कतरा भी नहीं है, मंटो को रुलाने से अत्यन्त घृणा थी। आज मैं उसकी याद में आंसू बहाकर उसे परेशान नहीं करूँगा आहिस्ते से अपना कोट पहन लेता हूँ और घर से बाहर निकल जाता हूँ।

सब जगह उसी तरह काम हो रहा है। आल इंडिया रेडियो भी खुला है और होटल का बार भी और उर्दू बाजार भी; क्योंकि मंटो एक बहुत मामूली आदमी था। वह एक गरीव कहानीकार था, वह कोई मंत्री नहीं था जो उसकी शान में झंडे झुका दिए जाते। आल इंडिया रेडियो भी खुला है; जिसने कि सैकडो बार उसकी कहानियो के ध्वनी नाट्य रूपांतरण किये हैं, उर्दू बाजार भी खुला है, जिसने उसकी हजारों किताबें बेचीं हैं और आज भी बेच रहे हैं। आज मैं उन लोगों कहकहा लगाकर देख रहा हूँ, जिन्होंने मंटो से हजारों रुपये कि शराव पी है...

लोगों ने गोर्की के लिए अजायब घर बनाये मूर्तियाँ बनाईं ,शहर बनाये और हमने मंटो पर मुक़दमे चलाये , उसे भूखा मारा उसे पागल खाने पहुँचाया , उसे अस्पतालों में सड।या और यहाँ तक मजबूर कर दिया कि वह किसी इंसान को नहीं शराब की बोतल को अपना दोस्त समझने को मजबूर हो जाये . हम इंसानों के नहीं मकबरों के पुजारी हैं . दिल्ली में मिर्जा गालिव की फिल्म चल रही है, इस फिल्म की कहानी इसी दिल्ली के मोरी गेट में बैठ कर मंटो ने लिखी थी ...मंटो दुबारा पैदा नहीं होगा यह मैं भी जानता हूँ और राजेन्द्र सिंह बेदी भी अस्मत चुगताई भी , ख्वाजा अहमद अब्बास भी और उपेन्द्रनाथ अश्क भी ।

' मन मुक्ता ' से साभार
ये पंक्तियाँ जुलाई १९५६ में छपी मंटो की किताब हवा के घोडे से ली गयीं हैं. इस पुस्तक में छपे कृशन चंदर के बेचैन करने वाले शब्द क्या आज भी उतने ही नए नहीं हैं? जबकि मंटो और कृशन चंदर को गुजरे एक जमाना बीत गया हैं .यथार्थ ज्यों का त्यों है.

Sunday, August 2, 2009

कन्यादान योजना एक अदूरदर्शी योजना

मध्यप्रदेश सरकार आजकल कन्यादान योजना चला रही है। प्रथम तो इस योजना के नामकरण पर ही प्रश्नचिन्ह लगना चाहिए .कन्यादान शब्द हिंदू समाज के लिए कलंक से ज्यादा नहीं है। हिंदू धर्म में दान का सर्वाधिक महत्व है जरूरतमंद को दान देना या उसकी मदद करना बुरा नही है। लेकिन हमें यह समझना चाहिए की दान वस्तुओं का होता है। चूंकि समाज में सदियों से स्त्री को भी वस्तु के रूप देखा गया है। इसलिए लोग कन्यादान करते हैं। अब यह कार्य मध्यप्रदेश सरकार ने अपने हाथों में लेलिया है।

अब यहाँ के नेता अधिक से अधिक वयस्क,अवयस्क लड़के,लड़कियों को इकठ्ठा करते हैं। उनकी शादियाँ करवाते हैं। कन्यादान करते हैं और पुण्य कमाते हैं। इसतरह अब मध्यप्रदेश के नेताओं को स्वर्ग मिलना लगभग तय हो गया है।

ये प्रश्न पूछा जाना चाहिए की क्या मध्यप्रदेश सरकार ने गरीब लड़केलड़कियों की शादी करवाने का ठेका ले रखा है? वैसे ही गरीब परिवार दो वक्त की रोटी बड़ी मुश्किल से कमापाता है। एक अन्य सदस्य बढ़ जाने से क्या उनकी गरीबी दूर हो जायेगी ?

यह मूर्खतापूर्ण योजना भविष्य में खतरे की घंटी है। क्योंकि ये विवाहित जोड़े आठ दस माह में दो से तीन होने वाले है। वैसे ही हमारे अनेक राज्य जनसँख्या के बोझ से दबे जारहे हैं। मध्यप्रदेश की कुल जनसँख्या ही थाईलैंड की जनसँख्या के बराबर है। क्या जनसँख्या की वृद्धिदर को देखते हुए इसतरह की योजनायें लाभकारी हैं? नेता वोटबेंक के चक्कर में इसप्रकार की योजनायें लागू करते रहते है इसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ता है। आपके क्या विचार है?

Wednesday, July 29, 2009

खुश रहने का ब्रांडेड तरीका -दूसरों पर शासन करने की प्रवृति से बाज आयें

हमारा समाज दिनोंदिन प्रगति के साथ-साथ इतना जटिल होता जा रहा है की सरल और निष्कपट जीवन जीना दुर्लभ प्रतीत होने लगा है। वह ख़ुद तो परतंत्र है ही दूसरों को भी इसी राह पर धकेलना चाहता है। नेता जनता पर एक छत्र राज्य चाहता है। गुरु अपने शिष्यों को जकड कर रखता हैकहीं पति अपनी पत्नी पर शासन करता है तो कहीं पत्नियाँ पति पर रौब झाड़ती हैं। कहीं पत्नी परेशान है तो कहीं पति प्रताडित है। कहीं पिता अपने पुत्रों पर शिकंजा कसे बैठा है, तो कहीं घर की मम्मियां अपनी लड़कियों को संस्कृति और नैतिकता का पाठ पढ़ा कर और प्रेम से वंचित कर चूला चौका सँभालने और गृहकार्य में दक्ष विवाह योग्य कन्या रुपी प्रोडक्ट तैयार करने में जुटी हैं। लगता है हर व्यक्ति ने एक दूसरे की स्वतंत्रता का अपहरण करने का जिम्मा ले रखा हैसंयुक्त परिवारों में किसी बड़े बुजुर्ग का सिक्का चलता है। और परिवार के अन्य सदस्यों की जुर्रत भी नहीं होती की वह उनकी किसी । ग़लत बात की अवहेलना कर सके। अवहेलना करना उनकी प्रतिष्ठा और मान सम्मान का सवाल वन जाता है।

शासित होना कोई नहीं चाहेगा जो पंख उड़ान भरने के लिए हैं उन्हें कटवाना कौन चाहेगा। अपनी स्वतंत्रता सभी को प्रिय होती है। एक प्रबुद्ध व्यक्ति किसी पर भी शासन नहीं करता है। इसके इतर शासन करने वाला व्यक्ति यह अपेक्षा करेगा की उसके आदेश का पालन किया जाए। अब यदि कोई अन्य उसके आदेश की अवहेलना करता है तो क्या होगा ? निस्संदेह वह क्रुद्ध हो जाएगा, हिंसक भी हो सकता है। क्योंकि दूसरों पर आधिपत्य जमाने वाला व्यक्ति कभी सकारात्मक नहीं होता है। किसी की ना सुनना उसे कभी नहीं सुहाता है।

प्रश्न उठता है यह आधिपत्य क्यों? यह शासन क्यों? क्या दो दिन की जिन्दगी में हम बिना दूसरों पर अधिकार किये जियो और जीनो दो की भावना से अपने आपको स्पंदित नहीं रख सकते?दूसरों पर लगाम लगाकर हम ख़ुद को आजाद कैसे रख सकते हैं? लगाम एक ऐसी हथकडी है जहाँ न हथकडी पहनने वाला स्वतंत्र है और न हथकडी पहनाने वाला। लगाम ढीली छोडिये। प्रेम, स्नेह , करुना आदि मानवीय गुणों को आत्मसात कीजिये आप भी खुश रहेंगे ,आपका परिवार भी , आपके मित्र भी।